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छह ढाला - दूसरी ढाल

Doosri Dhaala (Stanza -1) ऐसे मिथ्यादृग ज्ञान चर्ण ,बस भ्रमत भरत दुःख जन्म मर्ण ताते इनको ताजिये सुजान,सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान शब्दार्थ १.मिथ्यादृग -मिथ्या दर्शन २.चर्ण-चरित्र ३.बस-वशीभूत हो-कर ४.मर्ण -मरण के ५.भरत-भोग रहा है ६.ताते-इसलिए ७.सुजान-बहुत अच्छी तरह से जान कर ८.ताजिये-त्याग कीजिये. ९.तिन-इन तीनों का (मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र का) १०.संक्षेप-कम शब्दों में भावार्थ हमने पिछली ढाल में जाना के यह जीव जन्म मरण के दुखो को भोगता रहता है,और अनादी काल से भोगता आया है,इसका एक कारण तोह हमने पहली ढाल में ही जाना की इस जीव ने मोह रुपी महा मदिरा पी राखी है,जिसके कारण वेह संसार में भटक रहा है,यानी कि हम भी संसार में इसी के कारण भटक रहे हैं,अब कविवर ने इसका दूसरा कारण यह भी बताया है कि हमने मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र को अपने लिया है,यह जीव अनंत काल से मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र का पोषण कर रहा है,और इन मिथ्या ज्ञान चरित्र के वश में आकर संसार में भ्रमण कर रहा है और जन्म मरण के दुखों को सेहन कर रहा है,भोग रहा है,इसलिए कवि कह रहे हैं कि इनको ताजिये,इसीलिए इनका त्याग कीजिये….कवि कह रहे हैं…अब ...

छह ढाला - पहली ढाल

Dhala – 1 : (1st Shlok) जे त्रिभुवन में जीव अनंत,सुख चाहें दुःख तै भय्वंत, ताते दुखहारी सुख कार,कहे सीख गुरु करुना धार. शब्दार्थ १.जे-इस २.त्रिभुवन-तीनो लोकों में. ३.अनंत-जिसका अंत न हो. ४.तै-से ५.भय्वंत-डरते हैं. ६.ताते-इसलिए ७.दुखहारी-दुःख को हरने वाली ७.सुखकार-सुख को देने वाली ७.सीख-सिक्षा ८.गुरु-निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनि,सच्चे गुरु ८.करुना-कल्याणक की भावना. भावार्थ इस संसार में अनंतानंत जीव है,अनंत जीव राशी,इसका अंत ही नहीं है,चाहे कितने काल बीत जायें,यह संसार कभी खाली नहीं होगा,इन अनंतानंत जीवों में हर जीव सुख चाहता है,कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता है,चाहे वेह चीटीं हो,निगोदिया जीव हों,या पंचेंद्रिया,सैनी या असैनि पशु हो,मतलब कोई भी दुःख नहीं चाहता है,क्या हम दुःख चाहते हैं,नहीं न,इसी प्रकार कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता,लेकिन यह जीव पुद्गल में सुख खोजने लगता है,बल्कि असली सुख तोह आत्मा स्वाभाव में है,अन्यथा कहीं भी नहीं है,जब जीव को इस सच्चाई का एहसास होता है,यानी की सम्यक्दर्शन होता,जब हम अपने आत्मा स्वाभाव को जानते हैं,तोह हम अत्यंत हर्ष से भर जाते हैं,इसलिए(ताते) हमें यह बात अनंत द...