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छह ढाला - पहली ढाल


Dhala – 1 : (1st Shlok) जे त्रिभुवन में जीव अनंत,सुख चाहें दुःख तै भय्वंत, ताते दुखहारी सुख कार,कहे सीख गुरु करुना धार. शब्दार्थ १.जे-इस २.त्रिभुवन-तीनो लोकों में. ३.अनंत-जिसका अंत न हो. ४.तै-से ५.भय्वंत-डरते हैं. ६.ताते-इसलिए ७.दुखहारी-दुःख को हरने वाली ७.सुखकार-सुख को देने वाली ७.सीख-सिक्षा ८.गुरु-निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनि,सच्चे गुरु ८.करुना-कल्याणक की भावना. भावार्थ इस संसार में अनंतानंत जीव है,अनंत जीव राशी,इसका अंत ही नहीं है,चाहे कितने काल बीत जायें,यह संसार कभी खाली नहीं होगा,इन अनंतानंत जीवों में हर जीव सुख चाहता है,कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता है,चाहे वेह चीटीं हो,निगोदिया जीव हों,या पंचेंद्रिया,सैनी या असैनि पशु हो,मतलब कोई भी दुःख नहीं चाहता है,क्या हम दुःख चाहते हैं,नहीं न,इसी प्रकार कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता,लेकिन यह जीव पुद्गल में सुख खोजने लगता है,बल्कि असली सुख तोह आत्मा स्वाभाव में है,अन्यथा कहीं भी नहीं है,जब जीव को इस सच्चाई का एहसास होता है,यानी की सम्यक्दर्शन होता,जब हम अपने आत्मा स्वाभाव को जानते हैं,तोह हम अत्यंत हर्ष से भर जाते हैं,इसलिए(ताते) हमें यह बात अनंत दुःख का नाश करने वाली (दुःख हारी) और सुख कारी लगती है,और इस आनंद का अनुभव करवाने के लिए हमें सच्चे गुरु,निर्ग्रन्थ गुरु शिक्षा देते हैं,सीख देते हैं,वेह सीख क्या है हम उसे अगले दोहे में समझेंगे.. Dhala 1 : (Stanza -2) ताहि सुन भवि मन थिर आन,जो चाहो अपना कल्याण, मोह महामद पियो अनादि,भूल आपको भरमत वादी. भावार्थ :हे भव्या जीव, यदि तू अपना हित चाहता है तो, गुरु की शिक्षा को मन शांत व स्थिर करके सुन | जिस प्रकार एक शराबी शराब के नशे में धुत होकर यहाँ वहाँ गिरता पड़ता रहता है , उसी प्रकार यह जीव भी अनादि कल से मोह रूपी मदिरा के नशे में फंसकर अपने आत्मा स्वरूप को भूल जाता है और चारों गति में जन्म-मरण करके भटकता रहता है | Dhala 1: (Stanza -3) तास भ्रमण की है बहु कथा,पै कुछ कहूँ कही मुनि यथा काल अनंत निगोद मंझार,बीत्यो एकेंद्रीय तन धार. शब्दार्थ १.तास-उस संसार में. २.भ्रमण-भटकना. ३.बहु-बहुत सारी. ४.पै-मैं (यानी की कवि) ५.मुनि-निर्ग्रन्थ मुनि ६.कछु-थोडा सा ही ७.यथा-वैसा का वैसा,एक जैसा. ८.निगोद-एक ऐसी साधारण वनस्पति पर्याय जिसमें एक जीव में अनंत जीव विधमान होता है,यानी की एक जीव की गोद में अनंतानत जीव होतें हैं. ९.मंझार- चक्कर में फस के. भावार्थ: संसार में जन्म-मरण की अनेक कहानियाँ | कवि दौलटराम जी कहते हैं , जिस प्रकार मेरे पूर्व आचार्यों ने अपनी रचनाओं में इन कहानियों का उल्लेख किया है , उसी प्रकार मैं भी अपनी रचना में इस बारे में कहता हूँ , परंतु संक्षिप्त में| इस जीव ने नरक से भी बदतर निगोद में एकिन्द्रिय जीव के शरीर भी धारण किए हैं और अनंतानंत काल बिताए हैं! Dhala 1 : (Stanza -4) एक श्वाश में अथदस बार,जन्म्यो मरयो,सहयो दुःख भार निकसि भूमि जल पावक भयो,पवन प्रत्येक वनस्पति थयो शब्दार्थ १.श्वाश -एक सांस में २.अथदस-१८ बार ३.जन्म्यो-जन्मा ४.मरयो-मरा ५.निकसि-वहां से निकलकर,या उचट कर. ६.भूमि-भूमि कायिक जीव ७.जल-जल्कायिक जीव ८.पावक-अग्नि कायिक जीव ९.भयो-हुआ १०.पवन-वायु कायिक ११.प्रत्येक वनस्पति-वनस्पति कायिक जीव का एक प्रकार. भावार्थ कवि कहते है की निगोद, जो की नर्क से भी बदतर गत है, में इस जीव ने एक श्वास मात्र जीतने समय मे १८ बार जनम मरण करके बहुत भयनकर दुख सहन किये हैं! इन दुखो का बोझ सहतें हुए वह बड़ी कठिनाईयो से निकाला हैं और पृथ्वी, जल, अगनि वायु और प्रतेयक वानस्पतिकायी जीव के रूप मॅ उत्तपन हुआ हैं! Dhala 1 : (Stanza -5) दुर्लभ लहें जो चिंता मणि,त्यों पर्याय लहें त्रस त्रणी, लट,पिपील,अलि अदि शरीरा,धर धर मरयो सही बहुपीरा. शब्दार्थ १.दुर्लभ-बड़ी मुश्किल से मिलने वाली चीज २.लहें-लगे ३.चिंता मणि-एक अमूल्य मणि,बड़ी दुर्लभता से मिले ४.त्यों-वैसा ५.त्रस – दो,तीन और चार इन्द्रिय जीव. ६.पिपील-चीटीं ७.अलि-भौरां ८.धर-धर-बार बार ९.पीरा-दर्द १०.बहु-बहुत भावार्थ :जिस प्रकार चिंतामनी रतन बड़ी कठिनाईयो से मिलता हैं उसी प्रकार त्रस्त जीवों का शरीर पाना भी बहूत मुश्किल हैं| इस त्रस्त इंद्रिया जीवन मैं भी इस जीव ने लट आदि दो इंद्रिया जीव, कीड़ा आदि तीन इंद्रिया जीव ,भँवरा आदि चार इंद्रिया जीव वगेरा शरीरों को बार बार धारण कर मर्ण और अत्यंत दुख सहा हैं! Dhala 1 : (Stanza – 6) कबहू पंचेन्द्रिय पशु भयो,मन बिन निपट अज्ञानी थयो, सिंहादिक सैनी हैं क्रूर,निर्बल पशु हति खाए भूर. शब्दार्थ १.कबहू-कभी २.थयो-था ३.सैनी-मन-सहित जीव ४.निर्बल-कमजोर ५.हति-मार मार कर के ६.भुर-बहुत भावार्थ : यह जीव पंचेंद्रीय असन्ग्यि पशु भी हुआ हैं तो मन रहित होने की वजह से ज्ञान ग्रहण नही कर पाया और घोर दुख सहता रहा! कभी सन्ग्यि हुआ तो सिंह जैसा क्रूर और निर्दयी हुआ और अनेको निर्बल पशुओ को मार मार कर खाया और घोर अज्ञानी हुआ! Dhala 1 : (Stanza – 7) कबहू आप भयो बलहीन,सबलनिकरि खायो अतिदीन, छेदन,भेदन,भूख,पियास,भार सहन हिम आतप तरस. शब्दार्थ १.सबल निकरि-बलवान पशुओं ने २.अतिदीन-असमर्थता,कोई दया नहीं करता था ३.छेदन-छेद किये ४.भेदन-टुकड़े-टुकड़े करना ५.हिम-ठण्ड ६.आतप-गर्मी भावार्थ :पॅंच इंद्रियो में यह जीव स्वयम् ही निर्बल पशु के रूप में पैदा हुआ! असमर्थ होने के कारण यह अपने से बलवान पंशुओ द्वारा खाया भी गया! इसके अलावा भी इस जीव ने अत्यंत दुख सहे , कभी भेदे जाने के कारण, कभी काँटे जाने के कारण, कभी भूखे प्यासे रहने के कारण, कभी बोझा ढोने के कारण और सर्दी व गर्मी के कारण! Dhala 1 : (Stanza – 8) बध-बंधन अदिक दुःख घने,कोटि जीव ते जात न भने, अति संक्लेश भाव जो धरयो,घोर स्वभ्र सागर में परयो. शब्दार्थ 1.बध-बंधन-बलि,बंधन,पिटाई,सुताई अदि. 2..कोटि जीव-करोरों जिव्हाओं से 3..जात न भने-कहा नहीं जा सकता 4..संक्लेश-खोटे भाव 5.घोर स्वभ्र-नरक रुपी गहरा सागर भावार्थ: इस जीव ने त्रियांचगति में मारा जाना, बाँधना आदि अनेक दुख सहन किये; जो करोड़ो जिभो से भी नही कहे जा सकते और अंत में इतने बुरे परिणामो (अंतर्ध्यान ) से मारा की जिसे बड़ी कठिनता से पर किया जा सके ऐसे समुद्र समान घोर नरक मे जा पहुँचा! Dhala 1 : (Stanza – 9) तहां भूमि परसत दुःख इसो,बिच्छु सहस डसे नहीं तिसो तहां राध-श्रोणित वाहिनी,कृम्कुल्कलित देह-दाहिनी. शब्दार्थ १.तहां-उस नरक की २.परसत-स्पर्श ३.इसो-होता है ४.सहस-१००० ५.राध-श्रोणित–पीप और खून की ६.वाहिनी-नदी भावार्थ:उन नरको की भूमि का स्पर्शमात्र करने से नारकियो को इतनी वेदना होती हैं की हज़ारो बिछू एकसाथ डॅंक मारें, तब भी उतनी वेदना न हो! तथा उस नरक में रकट, मवाद और छोटे-छोटे कीड़ो से भारी हुई, शरीर में दाह उत्तपन करने वाली एक वैतरणी नदी हैं, किंतु वाहा तो उनकी पीड़ा अधिक भयंकर हो जाती है! (जीवों को दुख होने का मूल कारण तो उनकी शरीर के साथ ममता ही हैं; धरती का स्पर्श आदि तो मात्र निमित कारण हैं!) Dhala 1 : (Stanza -10) सेमर तरु दल-जुट असिपत्र,असि ज्यों देह विदारे तत्र, मेरु समान लोह-गल जाय,ऐसे शीत-उष्णता थाय. शब्दार्थ १.दल-जुत-पत्ते २-असि पत्र-तलवार की धार के सामान पत्ते ३.असि-तलवार ४.विदारे-तोडना ५.तत्र-उसी समय ६.शीत-ठण्ड ७..उष्णता-गर्मी ८..थाय-होती है भावार्थ: उन नार्कों में अनेक सेमल के वृक्ष हैं, जिनके पाते तलवार की धार के समान तीक्षण होते है! जब दुखी नारकी छाया मिलने की आशा लेकर उस वृक्ष के नीचे जाता हैं, तब उस वृक्ष के पत्ते गिरकर उसके शरीर को चीर देते हैं ! उन नारको मैं इतनी गर्मी होती हैं की एक लक योजन उँचे सुमेरू पर्वत के बराबर लोहें का पिंड भी पिघल जाता हैं तथा इतनी ठंड पड़ती हैं की सुमेरू के समान लोहे का गोला भी गाल जाता हैं! जिस प्रकार लोक मे कहा जाता हैं की ठंड के मारे हाथ अकड़ गये, हिम गिरने से वृक्ष या अनाज जल गया आदि! यानि अतिश्य प्रचंड ठंड के कारण लोहे के चिकनाहट कम हो जाने से उसका सकन्ध् बिखर जाता हैं! Dhala 1 : (Stanza -11) तिल-तिल करे देह के खंड,असुर भिडावें दुष्ट प्रचंड, सिन्धु नीर से प्यास न जाए,तोह पण एक न बूंद लहे शब्दार्थ. १.तिल-तिल-छोटे-छोटे २.खंड-टुकड़े ३असुर-असुर कुमार देव ४.भिडावे-लड़ते हैं ५.प्रचंड-भयानक दुःख ६.सिन्धु नीर-सागर के पानी ७.पण-पानी भावार्थ: उन नार्कों मे नारकी एक दूसरे को दुख देते रहते हैं अतर्थ कुतो की भाँति हमेश आपस मैं लड़ते रहते हैं! वे एक- दूसरे के शरीर के टुकड़े- टुकड़े कर डालते हैं, त्थपि उनके शरीर बारॅम्बार पारें की भाँति बिखर कर फिर जूड जानते हैं! संक्लिष्ट परिणाम वेल अंबरीष आदि जाति के असुर कुमार देव पहले, दूसरे तथा तीसरे नरक तक जाकर वहाँ की तीव्र यातनाओ मे पड़े हुए नारकियों को अपने अवधिज्ञान के द्वारा परस्पर वेर बतलकर आठवाँ क्रूरता और कुतूहल से आपस मे लड़ातें हैं और स्वयं आनंदित होते हैं! उन नारकी जीवों को इतनी महान प्यास लगती हैं की मिल जाए तो पूरे महासागर का जल भी पी जाए, तथापि त्रिशा शांत न हों; किंतु पीने के लिए जल की एक बूँद भी नही मिलती! Dhala 1 : (Stanza -12) तीन लोक का नाज जु खाय,मिटे न भूख,कणा न लहाय, यह दुःख बहु-सागरलौ सहें,करम-जोगते नर गति लहें. शब्दार्थ १.तहां-उस नरक की २.परसत-स्पर्श ३.इसो-होता है ४.सहस-१००० भावार्थ उन नरको मैं इतनी तीव्र भूख लगती हैं की यदि मिल जाए तो तीनो लोक का अनाज एकसाथ खा जाए, तथापि क्षुधा शांत न हो; परंतु वाहा खाने के लिए एक दाना भी नही मिलता! उन नारको मे यह जीव ऐसे अपर दुख दीर्घकाल भोगता हैं! फिर किसी शुभकर्म के उदय से यह जीव मनुष्यगति प्राप्त करता हैं! Dhala 1 : (Stanza -13) जननी उदर वस्यो नवमास,अंग संकुचते पायी त्रास, निकसत जे दुःख पाए घोर,तिनको कहत न आवे ओर शब्दार्थ १.जननी-माता २.उदर-पेट ३.नवमास-नौ महीने ४.संकुचते-सिकुड़े रहे ५.त्रास-दुःख ६.निकसत-निकलने में ७.तिनको-जिनको भावार्थ मनुष्यगती मे भी यह जीव नौ महीने तक माता के पेट मे रहा; वहाँ शरीर को सिकोडकर रहने से तीव्र वेदना सहन की, जिसका वर्णन नही किया जा सकता! कभी-कभी तो माता के पेट से निकलते समय माता का अथवा दोनो का मर्ण भी हो जाता हैं! Dhala 1 : (Stanza -14) बालपने में ज्ञान न लहो,तरुण समय तरुणीरत रहो, अर्ध मृतक सम बुढ़ा पनो,कैसे रूप लखै आपनो शब्दार्थ १.ओर-अंत २.लहो-ज्ञान नहीं रहा ३.तरुण-जवानी ४.तरुणी-जवान स्त्री ५.अर्ध मृतक-मरे के सामान ६.रूप-आत्मा स्वाभाव ७.लखे-पहचाने भावार्थ मनुष्यगती मे भी यह जीव बाल्यावस्था मे विशेष ज्ञान प्राप्त नही कर पाया; योवानवस्था मे ज्ञान तो प्राप्त किया, किंतु स्त्री के मोह मे भुला रहा और वृधवस्था मे इंद्रियों की शक्ति कम हो गई अथवा मर्न्प्र्यन्त पहुँचे ऐसा कोई रोग लग गया की, जिससे अधमरा जैसा पड़ा रहा! इस प्रकार यह जीव तीनो अवस्थाओ मे आत्मस्वरूप का दर्शन न कर सका! Dhala 1 : (Stanza -15) कभी अकाम निर्जरा करै,भवनात्रिक में सुर तन धरै विषय चाह दावानल दह्यो,मरत विलाप कर अति दुःख सहयो. शब्दार्थ 1.अकाम -समता भाव से दुखों को सेः २. निर्जरा-कर्मों का एक देश झर जाना. ३.भवनात्रिक-व्यंतर,ज्योतिषी और भवन वासी देव. ४.धरै-धारण किया ५.दावानल-भयंकर अग्नि ६.विषय-चाह-पांचो इन्द्रियों की विषय की चाहत ७.विलाप-दुखी होकर ८.सहयो-सेहन किया भावार्थ जब कभी इस जीव ने अकम निर्ज़ारा की, तब मारकर उस निर्ज़ारा के प्रभाव से भवनवासी, व्यांतर और ज्योतिषी देवो मे से किसी एक का शरीर धारण किया! वहा भी अन्य देवो का वैभव देखकर पंच इंद्रियों के विषयों की इचारूपी अगनि मे जलता रहा! फिर मंडरमाला को मुरझाते देखकर तथा शरीर और आभूषनो की कांति क्षिणा होते देखकर अपना मृत्यूकाल निकट हैं ऐसा अवधिज्ञान द्वारा जानकर अब ये भोग मुझे भोगने को नही मिलेंगे! ऐसे रो रो कर अनेक दुख सहन किए! Dhala 1 : (Stanza -16) जो विमानवासी हूँ थाय ,सम्यकदर्शन बिन दुःख पाय, तहते चय थावर तन धरै,यों परिवर्तन पूरा करै. शब्दार्थ 1.विमान वासी – जो देव विमानों में निवास करते हैं २. हूँ-भी. ३.थाय-हुआ ४.सम्यक दर्शन-आत्मा के सच्चे श्रद्धान ५.तहते-उस सुर गति से ६.चय-आयु पूरी करके ७.थावर-स्थावर योनियाँ ८.परिवर्तन-पांच(द्रव्य,क्षेत्र,भाव,काल और भाव) के परिवर्तन भावार्थ यह जीव वेमाणिक देवो मे भी उत्तपन्न हुआ, किंतु वहा इसने सम्गय्दर्शन के बिना दुख उठाए और वहा से भी मारकर पृथ्विकायिक आदि स्थावरों के शरीर धारण किये अतर्थ पुन: तिर्यन्च्गति मे जा गिरा! इस प्रकार यह जीव अनादिकाल से संसार मे भटक रहा हैं और पाँच प्रावर्तन कर रहा हैं!

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छह ढाला - दूसरी ढाल

Doosri Dhaala (Stanza -1) ऐसे मिथ्यादृग ज्ञान चर्ण ,बस भ्रमत भरत दुःख जन्म मर्ण ताते इनको ताजिये सुजान,सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान शब्दार्थ १.मिथ्यादृग -मिथ्या दर्शन २.चर्ण-चरित्र ३.बस-वशीभूत हो-कर ४.मर्ण -मरण के ५.भरत-भोग रहा है ६.ताते-इसलिए ७.सुजान-बहुत अच्छी तरह से जान कर ८.ताजिये-त्याग कीजिये. ९.तिन-इन तीनों का (मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र का) १०.संक्षेप-कम शब्दों में भावार्थ हमने पिछली ढाल में जाना के यह जीव जन्म मरण के दुखो को भोगता रहता है,और अनादी काल से भोगता आया है,इसका एक कारण तोह हमने पहली ढाल में ही जाना की इस जीव ने मोह रुपी महा मदिरा पी राखी है,जिसके कारण वेह संसार में भटक रहा है,यानी कि हम भी संसार में इसी के कारण भटक रहे हैं,अब कविवर ने इसका दूसरा कारण यह भी बताया है कि हमने मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र को अपने लिया है,यह जीव अनंत काल से मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र का पोषण कर रहा है,और इन मिथ्या ज्ञान चरित्र के वश में आकर संसार में भ्रमण कर रहा है और जन्म मरण के दुखों को सेहन कर रहा है,भोग रहा है,इसलिए कवि कह रहे हैं कि इनको ताजिये,इसीलिए इनका त्याग कीजिये….कवि कह रहे हैं…अब ...